हाई कोर्ट- विवाह के बाद बसी महिलाओं का आरक्षण नही छीना जा सकता है।

“जिस्टिस जयकुमार पिल्लई की बेंच”

इन्दौर

W.P. No.10277/2021

Reserved on : 08/12/2025
Post on : 12/01/2026

मध्यप्रदेश इन्दौर खण्डपीठ ने कहाँ है कि विवाह करके किसी अन्य राज्य से मप्र. राज्य में आ कर बसी महिलाओं को आरक्षण से वंचित कैसे किया जा सकता है।

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कौई महिला विवाह करके एक से दूसरे राज्य में जाती है, यदि महिला अभ्यार्थी ने मध्यप्रदेश डोमिशियल प्रमाण पत्र प्राप्त किया है उनकी जाति या समुदाय दोनो राज्यों में समान आरक्षित श्रेणी में शामिल है तो उन्हे आरक्षण का पूर्ण लाभ मिलना चाहिए।

कोई भर्ती बोर्ड अपने नियम शर्तों में बाद में बदलाव नही कर सकता है सभी को अपना हक मिलना चाहिए।

प्रश्न- उच्च न्यायालय में कैसे पहुँचा यह मामला?

यह मामला प्रदेश में उच्च माध्यमिक शिक्षक भर्ती से जुड़ा है।

महिला अभ्यार्थियों ने आरक्षण श्रेणी में आवेदन किया था। परीक्षा उत्तीर्ण की और दस्तावेज सत्यापन में भाग लिया, उस दौरान अभ्यार्थियों को इस आधार पर बाहर या सत्यापन निरस्त कर दिया की उनका जाति प्रमाण पत्र अन्य राज्य का था पर उनका विवाह मध्यप्रदेश में हुआ था।

उत्तराखण्ड हाई कोर्ट-

इससे पहले नवंबर 2025 में उत्तराखण्ड हाई कोर्ट विपरित निर्णय सुना चुका है- विवाह कर राज्य में बसने भर से किसी महिला को बसने वाले राज्य का आरणक्षण नही मिलता।

  • आरक्षण राज्य का विशिष्ठ अधिकार है।
  • जाति का दर्जा जन्म से तय होता है विवाह से नही चाहे उत्तराखण्ड का निवास प्रमाण पत्र बना हो।
  • प्रदेश निवासी को ही आरक्षण मिलना चाहिए।

अर्थात उत्तराखण्ड हाई कोर्ट ने विवाव करके राज्य में बसने वाली महिलाओं को आरक्षण देने से इन्कार कर दिया।

हाईकोर्ट की साफ़ राय

हाईकोर्ट ने कहा कि:

  • भर्ती के नियमों और विज्ञापन में कहीं भी यह नहीं लिखा था कि
    जाति प्रमाण-पत्र केवल मध्यप्रदेश का ही होना चाहिए
  • अगर किसी महिला की जाति उसके जन्म वाले राज्य और मध्यप्रदेश — दोनों में ही SC / ST / OBC में आती है,
    तो सिर्फ इस कारण से कि प्रमाण-पत्र दूसरे राज्य का है, उसे अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।
  • भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद नए नियम बनाना या शर्तें जोड़ना गलत है
  • केवल तकनीकी कारण बताकर आरक्षण का लाभ छीन लेना न्यायसंगत नहीं है

कोर्ट का अंतिम फैसला

  • सभी महिलाओं की याचिकाएँ मंज़ूर की गईं
  • उनकी उम्मीदवारी रद्द करने के आदेश खारिज कर दिए गए
  • सरकार को आदेश दिया गया कि:
    • यह जाँच करे कि उनकी जाति दोनों राज्यों में आरक्षित है या नहीं
    • जो योग्य हों, उन्हें नियुक्ति दी जाए
    • सीनियरिटी, वेतन और अन्य सभी लाभ भी दिए जाएँ।
  • यह पूरी प्रक्रिया 60 दिनों के भीतर पूरी की जाए।
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